Dev Uthani Ekadashi / Gyaras देवउठनी ग्यारस

Dev Uthani Ekadashi / Gyaras

Dev Uthani Ekadashi / Gyaras in Hindi देवउठनी ग्यारस

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ||

उत्तिष्ठो उत्तिष्ठ गोविंदो, उत्तिष्ठो गरुड़ध्वज |

उत्तिष्ठो कमलाकांत, जगताम मंगलम कुरु ||

नमस्कार मेरे प्यारे भाइयों और बहनों ,

आज हम देवउठनी ग्यारस के बारे में जानकारी लेंगे

देवउठनी ग्यारस Dev Uthani Ekadashi / Gyaras in Hindi

देवउठनी ग्यारस मतलब भगवान को उठाने वाली ग्यारस.  ग्यारस मतलब एकादशी. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी मतलब ही देवउठनी ग्यारस. देवउठनी ग्यारस देवत्थान एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी, देवउठनी एकादशी आदि नामों से जानी जाती है.

एकादशी तिथि वैसे तो भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित होती है. हर महीने में दो एकादशी आती है. एक कृष्ण पक्ष में तो दूसरी शुक्ल पक्ष में. हर एकादशी का अलग-अलग महत्व होता है. इसी तरह देवउठनी ग्यारस भी अपने आप में खास है.  भगवान विष्णु 4 माह के बाद यानी कि चातुर्मास के बाद आज की तिथि पर ही लंबी निद्रा से उठते हैं. इसीलिए इस एकादशी को देवउठनी ग्यारस का जाता है.

4 नवंबर 2022, शुक्रवार को देवउठनी ग्यारस आ रही है. वैसे तो 3 नवंबर 2022 को ही शाम को ग्यारस तिथि का आरंभ हो रहा है. परंतु उदय तिथि के आधार पर देव उठनी ग्यारस 4 नवंबर को मनाई जाएगी.

देवउठनी ग्यारस का पूजा मुहूर्त Dev Uthani Ekadashi / Gyaras Pooja Tithi in Hindi

  • तिथि देवउठनी ग्यारस
  • तारीख: 4 नवंबर 2022
  • वार: शुक्रवार
  • समय: सुबह 06:35 मिनट से सुबह 10:42 मिनट तक
  • लाभ उन्नति मुहूर्त: सुबह 07:57  मिनट से सुबह 09:20 मिनट तक
  • अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त: सुबह 09:20 से सुबह 10:42

देवउठनी ग्यारस पूजा विधि Dev Uthani Ekadashi / Gyaras Pooja Vidhi in Hindi

एकादशी के दिन क्या हुआ व्रत अगले दिन यानि द्वादशी पर खोला जाता है. ग्यारस को घर में चावल और चावल से बनने वाले चीजें नहीं बनाते हैं. योग पूरा दिन फलाहार, उपवास के पदार्थ ही खाने चाहिए. अगर संभव हो तो नमक एक ही बार ग्रहण करें. ग्यारस का पूरा दिन विष्णु पूजा, विष्णु भक्ति, भजन कीर्तन में बिताना चाहिए. 

  • देवउठनी ग्यारस को सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करें. एवं व्रत का संकल्प लें.
  • शाम को भगवान स्थल पर घी का दीपक जलाएं. कई लोग मिट्टी के 11 दिए भी जलाते हैं.
  • भगवान श्री विष्णु को सिंघाड़ा, लड्डू और फल अर्पित करें.
  • घंटा, शंख, नगाड़ा, मृदंग या वीणा  बजाए.
  •  विविध प्रकार के खेल कूद, नाच गाना गाय
  • भगवान विष्णु के प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर उन्हें जगाने के लिए  आवाहन करें. नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करें.

उत्तिष्ठो उत्तिष्ठ गोविंदो, उत्तिष्ठो गरुड़ध्वज |

उत्तिष्ठो कमलाकांत, जगताम मंगलम कुरु ||

(उत्तर प्रदेश में की जाने वाली पूजा)
  • पूजन के लिए भगवान का मंदिर अथवा सिंहासन को लता, पत्र ,फल पुष्प आदि से सजाते हैं.
  • आंगन में देवत्थान का चित्र बनाया जाता है. 
  • मिट्टी के भीतर पैदा होने वाली  फसल.  जैसे कि मूली, गाजर, आलू, गेहूं, कपास, गन्ना, गेहूं, ज्वार,मूंगफली, अलसी आदि 5 या 7 चीजें ले ले. 2-5सिक्के रख देते हैं. घी का दीपक जलाते हैं.
  •  परात के नीचे ऊपर दी गई सामग्री को रख देते हैं.
  •  परिवार के सभी सदस्यों के नाम लेकर एक गाना गाते हैं .(इस गाने का पिक में नीचे दे रही हूं)
  • परात के ऊपर जो काजल की जो परत आती है. उसे घर के सदस्य की आंखों में डाल देते हैं.
  • रसोई में गैस के पास गेरू एवं चुनेसे चित्र बनाते हैं.
  • घर में 5-7 जगह पर गेरू एवं चुने चित्र बनाते हैं.

प्रह्लाद, नारद, पुंडरीक, व्यास, शुक, आदि भगवान के भक्तों का स्मरण कर चरणामृत/ पंचामृत वितरित कर देते हैं. पश्चात एक रात में भगवान को विराजमान कर छोटी सी यात्रा निकाली जाती है.

भगवान विष्णु को योगनिद्रा का त्याग कर सभी प्रकार के क्रिया करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है. अंत में कथा पढ़कर प्रसाद का वितरण किया जाता है.

Dev Uthani Ekadashi / Gyaras

एकादशी की कथा Dev Uthani Ekadashi / Gyaras Story in Hindi

पुरातन काल में एक राजा था .उसके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत करते थे.

प्रजा, नौकर- चाकर यहां तक कि पशुओं को तक आना नहीं दिया जाता था.

एक दिन एक व्यक्ति उस राज्य में काम मांगने आया.

तब राजा ने एक शर्त रखी  की, “ रोज तो तुम्हें खाना दिया जाएगा परंतु एकादशी वाले दिन अन्न नहीं मिलेगा.”

काम की आवश्यकता रहने की वजह से वह मान गया. पर एकादशी वाले दिन जब उसे फलाहार दिया गया.

तब वो राजा के सामने जाकर गेट गिराने लगा. “मुझे अन्य चाहिए अन्यथा मैं भूखा मर जाऊंगा.”

यह सुन  राजा ने उसे शर्त के बारे में याद दिलाया. पर  वह मानने को तैयार नहीं था. आखिर का राजा ने उसे आटा चावल दाल दे दिया.

वह हमेशा की तरह नदी पर गया. स्नान कर भोजन पकाया. भगवान का स्मरण कर उन्हें पुकारने लगा, “ आओ भगवान! भोजन तैयार है.”

उसके बुलाने पर भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे. तथा प्रेम से उसके साथ भोजन किया. भोजन के पश्चात भगवान अंतर्धान हो गए.  वह अपने काम पर चला गया. 

प्रभु धाम

15 दिन बाद जब अगली एकादशी को वह राजा से दुगना समान मांगने लगा. कहने लगा उस दिन तुम्हें भूखा ही रह गया. राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि भगवान हो और मैं साथ में खाना खाते हैं. 

यह सुनकर राजा अचरज में आ गया. और उसकी बात को मानने से इनकार करने लग गया. राजा कहने लगा मैं इतनी पूजा करता हूं, व्रत रखता हूं आज तक तो भगवान ने मुझे दर्शन नहीं दिए. 

यह सुन वह राजा से बोला अगर आपको विश्वास ना हो तो आप साथ चल कर देखो.  राजा सच में उसके पीछे गया और एक पेड़ के पीछे छिप गया.  उस व्यक्ति ने भोजन बनाया. और भगवान को पुकारने लगा. शाम तक भगवान आए नहीं.  अंत में वह नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग ने लगा.

उसका प्राण त्यागने का दृढ इरादा जान शीघ्र ही भगवान प्रकट हो गए. और उसके साथ बैठकर भोजन करने लगे.  खा पी कर भी उसे अपने साथ अपने धाम ले गए. यह देख राजा ने सोचा व्रत- उपवास तब तक कोई फायदा नहीं होता जब तक मन शुद्ध ना हो.

 इस बात से राजा को ज्ञान मिला और वह मन से व्रत उपवास करने लगा अंत में स्वर्ग को प्राप्त हो गया.

सीख

इस कथा से हमें ज्ञान मिलता है, “अध्यात्म धर्म से नहीं, बल्कि मनसे होना चाहिए. विश्वास से होना चाहिए.”

देवउठनी ग्यारस कथा Dev Uthani Ekadashi / Gyaras Story in Hindi

एक शंखासुर नामक राक्षस था. उसने तीनो लोको में बहुत ही उत्पात मचाया हुआ था. सभी देवता के आग्रह पर भगवान विष्णु ने उस राक्षस से युद्ध किया. यह युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा.

परिणाम स्वरूप युद्ध में असुर मारा गया. इसके बाद भगवान विष्णु बहुत थक गए थे. 

अतः वे विश्राम करने चले गए. भगवान विष्णु की निद्रा कार्तिक शुक्ल एकादशी को  टूटी थी. सभी देवताओं ने भगवान विष्णु की पूजा की थी.

 शिव महापुराण

शिव महापुराण के अनुसार पुरातन काल में देशों का राजा दंभ था. वह बहुत बड़ा विष्णु भक्त था.

कई साल तक उसको कोई भी संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी.

इस वजह से उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की मदद से कृष्ण मंत्र प्राप्त किया था. 

राजा दंभ ने पुष्कर सरोवर में कठोर तपस्या कर मंत्र उच्चारण किया था. 

जिसके फल हेतु भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र रत्न दिया था.

 इस पुत्र का नाम शंखचूड़ रखा गया.  शंखचूड़ ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करी. 

 शंखचूड़ ने ब्रह्मा देव से अजर अमर का वरदान प्राप्त किया. कोई भी देवता उसे मार नहीं सकते थे.

ब्रह्मा जी ने  शंखचूड़ को बद्री बन जा कर  धर्म ध्वज के पुत्री तुलसी से विवाह करने की सलाह दी. शंखचूड़ ने ऐसा ही किया.

तुलसी एक पतिव्रता स्त्री  थी .दोनों सुख पूर्वक रहने लगे.

  शंखचूड़ भी पिता की तरह कृष्ण भक्त था. अपने  बल से शंखचूड़ ने असुरों, दानव, राक्षस, गंधर्व, नाग, किन्नर, मनुष्य तथा त्रिलोक पर अपना अस्तित्व जमा लिया. 

उसके अत्याचारों से पीड़ित समस्त दे भगवान विष्णु के पास सहायता की आशा से गए. भगवान विष्णु ने कहा शंखचूड़ की मृत्यु शिव भगवान के त्रिशूल से होगी.

शिव का चित्ररथ नाम का एक गण था. चित्ररथ भगवान शिव का दूत बनकर शंखचूड़ को समझाने गया, “ कि वह देवताओं का राज्य उन्हें लौटा दे.” परंतु शंखचूर ने मना कर दिया.  और भगवान शिव से युद्ध करने के लिए तैयार हो गया.

 भगवान शिव

शिव शंकर और शंखचूड़ में घमासान युद्ध हुआ. जैसे भगवान शिव ने शंखचूड़ को मारने के लिए अपना त्रिशूल उठाया.

ठीक उसी समय आकाशवाणी हुई, “ शंकर के हाथ में भगवान श्री हरि का कवच है और उसकी पत्नी का सतीत्व अखंडित है, तब तक इसका वध असंभव है.”

भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ के पास से हरी कवच मांग लिया. शंखचूड़ ने भी वह कवच बिना संकोच किए दे दिया.

शालिग्राम तुलसी विवाह क्यों किया जाता है Reason behind Marriage of Tulsi-Shaligram In Hindi

 इसके बाद भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप बनाकर तुलसी के पास गए.

 शंखचूड़ के लिबास में भगवान विष्णु ने तुलसी से अपने विजय की बात कही.  यह सुनकर तुलसी प्रसन्न हुई. 

पति रूप में आए भगवान का पूजन किया. इस बात से तुलसी का सतीत्व खंडित हो गया.

 भगवान शिव ने युद्ध में अपने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया.

 जब इस बात का पता तुलसी को लगा. तो वह क्रोधित हो उठी.  तुलसी ने भगवान विष्णु को कहा,

“ आपने छल पूर्वक मेरा धर्म भ्रष्ट किया है. मेरे पति की हत्या की है. इस कारण मैं आप को श्राप देती हूँ. आप पाषाण बनकर धरती पर ही रहोगे.”

तब भगवान विष्णु ने तुलसी को उनके पूर्वजन्म की याद दिलाई. और कहां तुम मेरे लिए बहुत तपस्या कर चुकी हो. 

इसी कारण तुम्हारा शरीर गण्डकी नामक नदी में बदल जाएगा. और इसी नाम से प्रसिद्ध होगा.

तुम पुष्पों में श्रेष्ठ तुलसी का वृक्ष बन जाओगे. और सदा मेरे साथ रहोगी.

 तुम्हारे श्राप को सत्य करने के लिए मैं पाषाण( शालिग्राम)  के रूप में रहूंगा.

गण्डकी नदी के तट पर मेरा वास होगा.

निष्कर्ष conclusion of Dev Uthani Ekadashi / Gyaras in Hindi

इसीलिए देवउठनी एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम वह तुलसी का विवाह संपन्न किया जाता है.

  इसी दिन से मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. 

हिंदू धर्म के मान्यता के अनुसार  तुलसी एवं शालिग्राम का विवाह करने से अपार पुण्य की प्राप्ति होती है. 

धन्यवाद

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